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सामाजिक जवाबदारी

Social Responsibility:
इस विषय पर मेरा 15 साल का अनुभव यहाँ व्यक्त करने का प्रयास किया है |

जाति, समुदाय और धर्म के संगठन : किस तरह से कर सकते है समाज के विकास, कल्याण  और उत्थान के लिए सकारात्मक  परिवर्तनकारी कार्य,  सामाजिक उत्तरदायित्व प्रकोष्ठ स्थापित करके |

विभिन्न धर्मों और समाजों, जातियों के संगठन, समूह, समाज, संघ और एकता मंच बने हुए हैं | सामाजिक स्तर पर सामूहिक रूप से विभिन्न आयोजन कार्यक्रम किए जाते हैं | विभिन्न आयोजनों में समाज, जाति और धर्म के संगठनों की एक विशिष्ठ भूमिका और योगदान होता हैं.

सामाजिक और नैतिक मर्यादा

हालाँकि कुछ स्तर पर समाज और जाति -बिरादरी के संगठन जो कर रहे हैं वह सामाजिक और नैतिक मर्यादाओं के अनुकूल नहीं हैं, लेकिन ऐसे मामलों का समाज के स्तर और कानून के स्तर पर आगे जाकर समाधान किया जाता हैं ? नहीं किया जाता हैं – तो किया जाना चाहिए, और किया जा सकता हैं | कई जाति बिरादरी और धर्म के संगठन अपने क्षेत्र में अपने गलत लोगों को बचाने और दूसरे समाज, जाति, समुदाय, क्षेत्र, धर्म के लोगों पर हमले, नुकसान करते हैं | उनके सदस्यों के मानवीय, नैतिक और सामाजिक अधिकारों के हनन और उनके अधिकारों पर हमले करते हैं, उनके अधिकार नष्ट करते हैं; ऐसा कार्यों के पीछे ऐसे संगठनों के कुछ चुनिन्दा लोगों की यह मानसिकता रहती हैं कि दूसरों को नुकसान पहुंचाकर वे अपना और अपने साथ वालों का फायदा करने का सोचते हैं और इसके लिए वर्चश्व कायम करने का सोचते हैं, जो कि जातिवाद, सांप्रदायिक और कानून विरोधी दायरे में आता हैं, जो सर्वथा अनुचित हैं और यह उनके स्वयं के लिए, उनके परिवार, जाति, बिरादरी, धर्म, और क्षेत्र के लिए भी नुकसानदायक हैं | हम जिस मानव समाज में रहते हैं ऐसा करना इस व्यवस्था के सर्वमान्य नियमों के विपरीत हैं |

सकारात्मक दिशा में सोच

लेकिन समाज और जाति के जो संगठन बने हैं वे मूलतः अपनी बिरादरी के विकास उत्थान के लिए बने हैं |  ऐसे लोगों को सही दिशा में लाने और सकारात्मक दिशा में सोचने और आगे बढाने के लिए उनके समाज के और दूसरे समाज के लोग आगे आते हैं, उन्हें सही रास्ता दिखाते हैं |  अगर उनका निजी, अनैतिक गैर कानूनी हित लाभ उसके पीछे निहित नहीं होता हैं तो वे सही दिशा में आगे जाते हैं. वे अपने दायरे में जो करते हैं उनके लिए समाज कानून और व्यवस्था हैं. अगर संगठन अपने पास उपलब्ध दायरों के तहत, जिस दावे और जाहिर तौर पर कही जाने वाली बात और उद्देश्य के लिए बनाए गए हैं, उस हेतु वास्तव में संकल्परत, कार्यरत हैं या अमल करते हैं तो वे संगठन, संघ, बिरादरी, समुदाय कम से कम अपने दायरे और उपलब्ध संसाधनों से अपने परिवार, जाति, बिरादरी, समाज, धर्म के लोगों का तो विकास और कल्याण कर ही सकते हैं, करते हैं और करना चाहिए तभी वह उद्देश्य सिद्ध होगा |

 

जाति के आधार पर बने उन संगठनों, समाजों, समुदायों के बारे में उनकी जाति और बिरादरी तक ही सिमटे जाने तक उनको परिभाषित करने वाली सोच के अपने अलग अलग मायने हैं, और जो जिन सन्दर्भों में जो जैसा सोचते हैं उनके वह उनके अनुसार हैं |  लेकिन अगर इसे व्यापक दृष्टि में सकारात्मक दृष्टिकोण से सोचा जाए तो इसे इस प्रकार देखा जाए कि विकास और उत्थान के बारे में शुरुआत अपने परिवार, समूह, जाति, बिरादरी, राज्य, धर्म, देश से की जा रही हैं, की जाति हैं और यह आगे जाकर दूसरों के परिवार, दूसरे समूह, दूसरी जाति, दूसरी बिरादरी, दूसरे धर्म, दूसरे प्रदेश, दूसरे देश के व्यक्तियों, सदस्यों, नागरिकों तक और उनके लिए की जाती हैं, की जा सकती हैं | अपने परिवार, समाज, जाति धर्म, प्रदेश के लिए जन कल्याण की भावना रखने वाले और उसे अपनों तक अपनों केउत्थान को मूर्त रूप देने वाले और देने वालों में से और उनमें से ही आगे चलकर दूसरे परिवारों, समुदायों, बिरादरियों, धर्मों, प्रदेशों, देशों के व्यक्तियों, सदस्यों और नागरिकों के कुछ या कई लोग बारे में सोचते हैं, वे व्यक्ति सामाजिक और समाज सुधारक, जन कल्याणकारी बनते हैं, बनते देखे गए हैं, बन सकते हैं और बने हैं | समाज के व्यापक विकास की दृष्टि और दिशा, इसी मापदंड के अनुसार चले और निर्धारित हो तो समरसता और सामंजस्य बने रहते हुए सर्वजन कल्याण, सर्वजन हित और सर्वजन सुख की निर्धारित व्यापक सामाजिक अवधारणा, सामाजिक सोच की तरफ यह आगे चलती रहेगी और बनी रहेगी |  व्यवस्था में परिवर्तन स्वतः नहीं होते हैं, कुछ व्यक्ति पहले अपने सिमित दायरे और बाद में जैसा उनको जैसी परिस्थिति मिलती हैं उस प्रकार व्यापक रूप से आगे बढ़कर उसे और व्यापक रूप देते हैं और समाज सेवा और समाज कल्याण का व्यापक रूप निर्धारित होकर सामने आकर मूर्त रूप लेता हैं.

इस दृष्टि से ही समाज, जाति, बिरादरी और धर्मों के जो संगठन बने हुए हैं वे अपने समाज के सदस्यों के हित, उत्थान और कल्याण के लिए कार्य कर सकते हैं इसे परिभाषित करने के दायरे काफी ज्यादा हैं लेकिन उपलब्ध संसाधनों या संसाधन उपलब्ध करवाकर और विकास की दिशा में वैचारिक स्तर पर समाज और समाज के लोगो का समाज के लोगो द्वारा विकास किया जा सकता है |

एक कोई जाति-संगठन अगर सक्षम हैं तो वह हमारे देश समाज में अन्य जातियों के जरूरतमंद मेहनती लोगों के लिए भी आर्थिक सहायता कर सकते हैं. इस प्रकार के संगठनों में संपन्न व्यक्तिओं के समूह और कुछ व्यापारिक संस्थाएं भी आ सकती है जिसमें व्यापर या कार्य से जुड़े सदस्य हों. ऐसे संगठनों में विभिन्न जाति बिरादरी और धर्म के लोग भी जुड़े रहते है इस लिहाज से भी वे जन कल्याण और सहायता की दिशा में अपने मापदंड तय कर सकते है.

अतुल जैन (बंटी)
सामाजिक कार्यकर्ता