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होली, हिन्दुओ का एक लोकप्रिय प्राचीन त्यौहार

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होली पर्व

होली, हिन्दुओ का एक लोकप्रिय प्राचीन त्यौहार है| यह बहुत ही मनोरंजक त्यौहार हैं| एक दूसरे पर रंग डालने व अपने साथी के चेहरे को रंगीन बना देने में कितना आनन्द आता है| होली का त्यौहार बच्चो के लिए बड़ी ख़ुशी व मोज-मस्ती का त्यौहार हैं, रंग खेलने के एक दिन पहले होलिका जलायी जाती हैं|

 इस दिन गाँव के किसान अपनी फसल के नये दाने अग्नि को चढ़ाते हैं| होलिका की अग्नि में नये अन्न चढ़ाने के बाद ही किसान नया अन्न खाना शुरू करता हैं|

दूसरे दिन रंग खेला जाता है| यधपि रंग के कई दिन पहले से ही लोग होली गीत (होली के गाने) व खेलना शुरू कर देते हैं लेकिन रंग के दिन प्रातःकाल से लोग रंग के साथ खेलना शुरू कर देते है|

लोग एक दूसरे पर अबीर गुलाल लगाते हैं, रंग छिडकते हैं और गले मिलकर होली की बधाई देते हैं|

बच्चे अपने दोस्तों को रंग से भर देने की ताक में रहते हैं| मोका मिलते ही वह अपने दोस्तों को रंग से सराबोर कर देते हैं| फिर सब ख़ुशी के मारे उछल पड़ते हैं और हँसते हैं|

होली मेल एवं एकता का पर्व हैं| यह सबके साथ प्रेम से खेलने के लिए हैं, इसलिए इस मोके पर किसी पर कीचड़ आदि गलत चीजे नहीं डालनी चाहिए| केवल प्यार व प्रेम से रंग खेलना चाहिए|

फाल्गुन का महीना हिन्दू पंचांग का अंतिम महीना है| इस महीने की पूर्णिमा को फाल्गुनी नक्षत्र होने के कारण इस महीने का नाम फाल्गुन है| इस महीने को आनंद और उल्लास का महीना कहा जाता है| इस महीने से धीरे धीरे गरमी की शुरुआत होती है, और सर्दी कम होने लगती है| बसंत का प्रभाव होने से इस महीने में प्रेम और रिश्तों में बेहतरी आती जाती है| इस महीने से खान पान और जीवनचर्या में जरूर बदलाव करना चाहिए| मन की चंचलता को नियंत्रित करने के प्रयास करने चाहिए| इस बार फाल्गुन मास 01 फरवरी से 02 मार्च तक रहेगा|

ग्रामीण क्षेत्रों में होली पर्व

ग्रामीण क्षेत्रों में इस पर्व से सामाजिक जुड़ाव काफी गहरा देखने को मिलता है क्योंकि होली के पंद्रह बीस दिन पहले से ही गोबर के पतले पतले उपले और अंजुलि के आकार की गुलेरियां बनाना प्रारम्भ हो जाता है। इनके बीच में बनाते समय ही उंगलि से एक छेद बना दिया जाता है। इनके सूख जाने पर इन्हें रस्सियों में पिरोकर मालाएं बनाई जाती हैं। होलिका दहन के दो तीन दिन पूर्व खुले मैदानों और अन्य निर्धारित स्थानों पर होली के लकड़ी कण्डे आदि रखना प्रारम्भ कर दिया जाता है। उनमें ही रख दी जाती हैं मालाएं।  होली की अग्नि में पौधों के रूप में उखाड़े गए चने, जौ और गेहूं के दाने भूनकर परस्पर बांटने की भी परम्परा है।

 यह भारतीय मूल के हिंदुओं द्वारा हर जगह मनाया जाता है हालांकि, यह मुख्य रूप से भारत और नेपाल के लोगों द्वारा मनाया जाता है। यह एक त्यौहारी रस्म है, जिसमे सब एक साथ होलिका के आलाव को जलाते है, गाना गाते है और नाचते है, इस मिथक के साथ कि सभी बुरी आदतें और बुरी शक्तियॉ होलिका के साथ जल गयी और नई ऊर्जा और अच्छी आदतों से अपने जीवन में उपलब्धियों को प्राप्त करेंगें। अगली सुबह उनके लिये बहुत खुशियॉ लेकर आती है जिसे वे पूरे दिन रंग गुलाल खेलकर व्यक्त करते हैं

होली में जिस तरह रंगों की विभिन्नता देखने को मिलती है उसी प्रकार इसको मनाये जाने के प्रकार में भी देश के विभिन्न प्रांतों में भिन्नता देखने को मिलती है। इस दिन उत्तराखंड के कुमाउं की गीत बैठकी में शास्त्रीय संगीत की गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं तो हरियाणा में भाभी द्वारा देवर को सताए जाने का सब आनंद लेते हैं। महाराष्ट्र में सूखा गुलाल खेलने और गोवा में जलूस निकालने के बाद सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है तथा पंजाब में होला मोहल्ला में सिखों की ओर से शक्ति प्रदर्शन किये जाने की परंपरा है। छत्तीसगढ़ की होरी में लोक गीतों की अद्भुत परंपरा है और मध्य प्रदेश के मालवा अंचल में भगोरिया तथा गुजरात के आदिवासी इलाकों में यह पर्व बेहद धूमधाम से मनाया जाता है आदिवासी समुदाय अपनी कला व संस्कृति को लेकर समाज में एक अलग पहचान बनाए हुए है। रंगों का पर्व होली भी इस वर्ग के बहुलता वाले क्षेत्रों के कुछ गांवों में कई दिन पूर्व ही मनाई जाती है। इसका कारण बताया जा रहा है कि परंपरा पुरानी है। कुल देवता को खुश रखने के लिए वे परंपरागत धार्मिक विधियों पर विश्वाश करते आ रहे हैं। 

 ब्रज क्षेत्र में तो होली पूरे 9 दिनों के त्योहार के रूप में मनाई जाती है। धुलेंडी के दिन रंग और गुलाल के साथ इस पर्व का समापन होता है। होली के इन 9 दिनों का उल्लास और मस्ती ब्रज क्षेत्र में देखते ही बनती है। बरसाने की लठमार होली काफी प्रसिद्ध है। इसमें पुरुष महिलाओं पर रंग डालते हैं और महिलाएं उन्हें लाठियों तथा कपड़े के बनाए गए कोड़ों से मारती हैं। मथुरा और वृंदावन में तो 15 दिनों तक होली का पर्व मनाया जाता है। 

बिहार में फगुआ जम कर मौज मस्ती करने का पर्व है। दिल्ली और आसपास के इलाकों में इस दिन डीजे और ढोल की थापों पर लोग नाचते गाते और एक दूसरे को गुजिया खिलाते नजर आते हैं।

बंगाल में होली को ‘डोल यात्रा’ व ‘डोल पूर्णिमा’ कहते हैं और होली के दिन श्री राधा और कृष्ण की प्रतिमाओं को डोली में बैठाकर पूरे शहर में घुमाया जाता है।

यह पर्व वैज्ञानिक कारणों के चलते भी अधिक प्रचलित हुआ है गर्मी के मौसम की शुरुआत और सर्दियों के मौसम के अंत में मनाया जाता है जब लोग स्वाभाविक रूप से आलसी और थका हुआ महसूस करते है। तो, इस समय होली शरीर की शिथिलता को प्रतिक्रिया करने के लिए बहुत सी गतिविधियॉ और खुशी लाती है। यह रंग खेलने, स्वादिष्ट व्यंजन खाने और परिवार के बड़ों से आशीर्वाद लेने से शरीर को बेहतर महसूस कराती है।

होली के त्यौहार पर होलिका दहन की परंपरा है। वैज्ञानिक रूप से यह वातावरण को सुरक्षित और स्वच्छ बनाती है क्योंकि सर्दियॉ और वसंत का मौसम के बैक्टीरियाओं के विकास के लिए आवश्यक वातावरण प्रदान करता है। पूरे देश में समाज के विभिन्न स्थानों पर होलिका दहन की प्रक्रिया से वातावरण का तापमान 145 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ जाता है जो बैक्टीरिया और अन्य हानिकारक कीटों को मारता है।

होली के दिन हर वर्ग के लोग टोलियां बनाकर अपने घर से निकलते हैं और दूसरों के घर जाकर रंग लगाते हैं, मिठाई खाते, खिलाते हैं और एक दूसरे को शुभकामनाएं प्रदान करते हैं। कई जगह तो इन टोलियों की ओर से सांस्कृतिक आयोजन भी किये जाते हैं। यह पर्व पारंपरिक रूप से दो दिन मनाया जाता है। पहले दिन को होलिका जलायी जाती है, जिसे होलिका दहन भी कहते है। दूसरे दिन, जिसे धुलेंडी कहा जाता है, लोग एक दूसरे को रंग लगाते हैं और ढोल या डीजे बजा कर होली के गीत गाये और बजाये जाते हैं।

यह भारतीय मूल के हिंदुओं द्वारा हर जगह मनाया जाता है हालांकि, यह मुख्य रूप से भारत और नेपाल के लोगों द्वारा मनाया जाता है। यह एक त्यौहारी रस्म है, जिसमे सब एक साथ होलिका के आलाव को जलाते है, गाना गाते है और नाचते है, इस मिथक के साथ कि सभी बुरी आदतें और बुरी शक्तियॉ होलिका के साथ जल गयी और नई ऊर्जा और अच्छी आदतों से अपने जीवन में उपलब्धियों को प्राप्त करेंगें। 

आप सभीको इस पावन पर्वकी ढेर सारी बधाई !!

अतुल जैन (बंटी)
सामाजिक कार्यकर्ता